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उधार खाता: भरोसा भी, बोझ भी

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उधार खाता: भरोसा भी, बोझ भी

जयपुर की एक पुरानी किराना दुकान के मालिक सिद्धार्थ को अपना उधार खाता खोलकर दिखाते हैं। 40 साल से चल रही दुकान में 180 परिवारों का उधार चलता है। वे बताते हैं कि यह भरोसा धंधे की नींव है, और यही सबसे बड़ा जोखिम भी।

  • उधार किसे देना है और किसे मना करना है, बिना रिश्ता खराब किए
  • महीने की 7 तारीख का नियम जिसने वसूली आसान कर दी
  • कॉपी से ऐप तक: खाता डिजिटल करने में क्या सीखा
  • जब एक बड़ा ग्राहक 60 हजार लेकर शहर छोड़ गया
  • तीन साल में फंसा पैसा आधा करने का तरीका

अगले एपिसोड में: दुकान ऑनलाइन कैसे लाएं, बिना किसी प्लेटफॉर्म के लुटे।

Transcript
नमस्ते, मैं सिद्धार्थ बहेती और यह है किराना से कंपनी तक, वह शो जिसमें हम छोटे व्यापारियों से उनके धंधे की असली कहानी सुनते हैं। आज हम जयपुर की एक ऐसी किराना दुकान में बैठे हैं जो 40 साल से चल रही है, और जिसके मालिक ने मुझे अपना उधार खाता खोलकर दिखाया है। 180 परिवार इस दुकान से उधार पर सामान लेते हैं। यही भरोसा इस दुकान की जान है, और यही वह चीज है जिसने एक बार इसे लगभग बंद करवा दिया था। आज हम बात करेंगे कि उधार किसे दें और किसे नहीं, महीने की 7 तारीख का वह नियम जिसने वसूली बदल दी, और वह दिन जब एक ग्राहक 60 हजार रुपये लेकर शहर छोड़ गया। साथ में यह भी कि फंसा हुआ पैसा तीन साल में आधा कैसे हुआ। आप सुन रहे हैं Witspeak Podcasts पर।
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